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रविवार, 14 अप्रैल 2013

PHILOSOPHY ON LOVE

SwaSaSan Welcomes You.  
प्रचलित मायनों में प्रेम का अर्थ स्त्री-पुरुष प्रेम संबंध है!
कुछ हद तक ठीक भी है ....
क्योंकि प्रेम का सर्वाधिक महत्वपूर्ण रिश्ता भी यही है!
इस विषय पर ढेरों किताबें लिखी जा चुकी हैं 
फिर भी कुछ ना कुछ कहने योग्य सदैव शेष है ;
चर्चित प्रेम दर्शनानुसार 
1.
जब तक दोनों केवल एक दूसरे से मिलने/ को देखने 
में खुशियाँ 
खोजते रहते हैं ....
प्रेम अंकुरण की स्थिति में होता है !
2.
जब दोनों केवल एक दुसरे की 
खुशी में ही सुख पाने लगते हैं .....
प्रेम पल्लवित हो चुका होता है!
3.
फिर जब प्रेम पादप को सीधे खड़े रहने
या लता की तरह बढ़ने के लिए,
यानी खुश रहने के लिए
एक-दूजे के अतिरिक्त 
थिएटर / पिज्जा हट/  पिकनिक /जल-बिहार/ बनाव श्रृंगार/ उपहार/
टी व्ही/फ्रिज/ए सी जैसे विभिन्न उप-साधनों की भी 
आवश्यकता पड़ने लगती है .....
तब प्रेम प्रौढ़ हो चुका होता है!
4.
जब एक दूजे और इन उप-साधनों के अतिरिक्त
बारम्बार तीसरे पक्ष की मध्यस्थता से
खुशी मिलने लगती है ...
तब इस प्रेम-बिटप में पतझड़ 
का प्रारम्भ हो चुका होता है!
(इसके बाद प्रेम-बिटप के पुनर्पल्लवन/पुनर्जीवन हेतु 
विशेष प्रयास की आवश्यकता होती है   !) 
5.
जब प्रेमान्कुरण से पतझड़ के बीच के किसी भी समय में
दोनों में से कोई एक या दोनों ही
किसी तीसरे में  
खुशियाँ तलाशने लगते हैं ...
तब प्रेम-बिटप मृत्यु शैय्या पर लेटा हुआ होता है!
जिसमें पुनर्जीवन की संभावनाएं अशेष सी होती हैं 
और किसी भी पल प्रेम-पादप 
बाहरी सुनामी का शिकार हो
दुखद मृत्यु  को प्राप्त हो सकता है !!!
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