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सोमवार, 30 नवंबर 2015

तेरा इकलौता खत....

स्वागत् है आपका SwaSaSan पर एवम् ....
तेरा इकलौता खत....
बिना हर्फों का, तेरा इकलौता खत....
है आज भी, मेरी सम्हाली हुई दौलत....
तूझसे भले कुछ भी लिखा ना गया ...
पर हजार बार में भी पूरा पढ़ा ना गया....
तेरा तो इशारों में किया वो इंकार था फकत ..... ...
ताउम्र पढ़ते रहे हम पीछे छुपी हुई वजह ...
हश्र जो होना था, हुआ वही अंजाम ....
हम गुमनाम, तुम बदनाम,
निभाने की कोशिश में रहे चारों ही नाकाम!!! ....
रोते हैं आज साथ-साथ, वे दुश्मन तमाम....
और कब तक होगा जाने,  यह इश्क का अंजाम!!!
- ‪#‎सत्यार्चन‬

..... अपेक्षित हैं समालोचना / आलोचना के चन्द शब्द...

रविवार, 29 नवंबर 2015

क्यों आते हैं... बुलाते हैं?

स्वागत् है आपका SwaSaSan पर एवम् ....

जी चाहा, चले आते हैं, ....
जी चाहे तो बुलवाते हैं....
कितने शिकवे जताते हैं ....
कुछ दर्द सुन जाते हैं....
कुछ हिदायतें दे लेते हैं ...
कुछ ताकीद भी कर जाते हैं ....
सोचने में अक्सर आता ह...
वो क्यों आते हैं .... ..... .... क्यों बुलाते हैं???- ‪#‎सत्यार्चन‬
..... अपेक्षित हैं समालोचना / आलोचना के चन्द शब्द...

लक्ष्मण-परसुराम संवाद निरंतर....

स्वागत् है आपका SwaSaSan पर एवम् ..... 
जाने क्यों आज राम-लक्ष्मण-परसुराम सम्वाद बहुत याद आया!
कैसे भरी सभा में लक्ष्मण की ऊधम से परसुराम झुंझलाते रहते हैं!
और लक्ष्मण ढिठाई से अधिकांश समय उनका मखौल उड़ाते ही रहते हैं!
पटाक्षेप से तनिक पहले राम आकर परसुराम को बहला कर लक्ष्मण की
 बचपने वाली भूल को अनदेखा करने राज़ी भी कर लेते हैं ....
और अपनी जय-जयकार भी करवा लेते हैं!
बस आजकल यही पंचायत से लेकर सं.रा.महासंघ में हो रहा है!...
सभी सभाओं में एकाध राम हैं जो,
 लाखों-लाख लक्ष्मणों से
 करोढ़ों परसुरामों का मखौल भी उड़वाते हैं और
परसुरामों से जय-जयकार भी कराये जा रहे हैं! ‪#‎जय_हो‬!
ना तब नायक राम पर प्रश्न उठाया जा सकता था ना आज!!!
ः- ‪#‎सत्यार्चन‬
..... अपेक्षित हैं समालोचना/आलोचना
 के चन्द शब्द...

शनिवार, 28 नवंबर 2015

दो पहलू

स्वागत् है आपका SwaSaSan पर...
परवाह नहीं जिन्दगी, तू जो चाहे  लिख जाये....
कांटे चाहे जितने, राह में  तू बिछाती जाये.... 
जीने ना दे जीते जी,  भले चैन का कोई पल.....
मरने से पहले बस इतना रहम फरमाये....
जब मौत आये तो आगोश साझा हों ....
दम उसका निकले औ मेरी साँस थम जाये!!!
- #सत्यार्चन
कौन कितना सराहेगा ,
नकारेगा कौन कितना,
क्यों सोचूँ?
जिन्दगी मिल्कियत मेरी,
जी भर जीना,
 हक मेरा!!...
- ‪#‎सत्यार्चन‬
.... एवम् अपेक्षित हैं समालोचना/आलोचना के चन्द शब्द...

सोमवार, 23 नवंबर 2015

मानवता को खतरा बनते "हमारे-अपने"?

स्वागत् है आपका SwaSaSan पर...

मेरे अपनों के आराध्य और मेरे प्रिय
सभी सामाजिक संगठन, उनके बहुत बड़े हितसाधक हो सकते थे, जिनका ये प्रतिनिधित्व करते हैं!
किन्तु: सभी में कुछ बुराईयां समान रूप से विद्यमान हैं कि
- सभी के मूल में प्रत्यक्ष या परोक्ष राजनैतिक लक्ष्य हैं.
- सभी हिंसक गतिविधियों के पक्षधर हैं, कुछेक के लिए तो बात मनवाने का आयसिस सा तरीका ही सबसे आदर्श है!
- सभी संगठनों के मुखियों को, उनके परिजनों से इतर, बलिदानी कार्यकर्ताओं की दरकार है!
- सभी जुनूनी आग को बुझने नहीं देना चाहते!
- सभी की सौहार्द्र से कट्टर दुश्मनी है!
- सौहार्द्र के संदेशकों का गला काटने सभी तत्पर हैं!
- सभी को राजनैतिक संरक्षण प्राप्त है!
इन जैसे अधिकांश संगठनों का गठन शोषण के विरुद्ध आक्रोश की बारूद के फटने जैसा हुआ था....
 जैसे चम्बल की घाटी में युगों से दबंगी से पीड़ित स्त्री/ पुरुष दस्यु सरदारों की शरण में जाकर
 आगे स्वयं दबंग बन, अन्य वंचकों के शोषक बन बैठना!.....
जैसे नक्सलियों का आंदोलन ध्यानाकर्षण से शुरु होकर समानांतर प्रशासक तक का हिंसक सफर ....
नक्सल और दस्यु समस्या का कुछ सीमा तक नियंत्रण केवल तब संभव हो सका है
जब संयुक्त प्रयास किये गये और इनके संरक्षकों को संरक्षण से वंचित किया गया!
मानवता के शत्रु बन चुके संगठनों को नेस्नाबूद करने शासन को यही करना होगा!
साथ ही, आज के आयसिस के तरीकों के पक्षधर दिखते सामाजिक संगठनों को,
मानवता के दुश्मन बनने से रोकना है, तो उन्हें जताया जाना होगा कि,
मानवता के मित्र, आपको मानवता की सीमा में रहते ही, साथ दे पायेंगे, या कि आपका साथ ले पायेंगे !
अन्यथा मानवता के मित्र अस्त्र-शस्त्र तो नहीं उठायेंगे किन्तु मानवता को नष्ट-भ्रष्ट भी नहीं होने देंगे!
आपसे केवल संबंध विच्छेद कर लेंगे, जैसा कि 31 जनवरी 1948 को, 
 रा. स्व. सं. के अनेक नियमित सदस्यों ने शाखाओं को सदा के लिए त्याग कर किया था!
#सत्यार्चन
...एवम् अपेक्षित हैं समालोचना/आलोचना के चन्द शब्द...

रविवार, 22 नवंबर 2015

स्वागत् है आपका SwaSaSan पर
कौन जाने,
किस-किस दरिया में,
समंदर सा जोर हो....
पर मौजों सा टकराने वाला,
बताओ, गर दूजा किसी ओर हो!!! ...
-
‪#‎सत्यार्चन‬
... एवम् अपेक्षित हैं समालोचना/आलोचना के चन्द शब्द...

Killing on Way of Worship!

स्वागत् है आपका SwaSaSan पर
How Surprising ...!!!
 n How Foolish are EXTRIMISTS in The World?
They are killing others' for different "Ways of Worships" ONLY!!!!!!!!!
WE ALL KNOW THE ALMIGHTY! or THE SUPREEMO!
which IS ONLY TRUTH !
 IT can't limited in any Name / Shape / Sex !
 IT can't prayed in any uniform way!
 JUST BEHAVING HUMAN IS IT's TRUE WORSHIP !!!
 Anti-Human can't recognized as HIS/HER Path finders!
 This is The Time When Human Has to use All Weapons Against Enemies!!!
 "Inhumanity's  Assassination" is Need Of The Hour !!!
‪#‎Sathyarchan‬
... एवम् अपेक्षित हैं समालोचना/आलोचना के चन्द शब्द...

रविवार, 15 नवंबर 2015

https://www.youtube.com/watch?v=XwK2upIvRU0


https://www.youtube.com/watch?v=XwK2upIvRU0
स्वागत् है आपका SwaSaSan पर... एवम् अपेक्षित हैं समालोचना/आलोचना के चन्द शब्द...

बुधवार, 11 नवंबर 2015

SwaSaSan: -: आओ हम दीप जलायें :-

SwaSaSan: -: आओ हम दीप जलायें :-: स्वागत् है आपका SwaSaSan पर...   -: आओ -: आओ हम दीप जलायें :- . आई है  फिर दीपमालिका  आओ हम दीप जलायें ! अधम पर दिव्य के विजय...

स्वागत् है आपका SwaSaSan पर... एवम् अपेक्षित हैं समालोचना/आलोचना के चन्द शब्द...

-: आओ हम दीप जलायें :-

स्वागत् है आपका SwaSaSan पर...
 
.
आई है  फिर दीपमालिका 
आओ हम दीप जलायें !
अधम पर दिव्य के विजयोत्सव पर 
सब मिल दीप जलायें !
.
किसी क्षुधित व्याकुल निर्धन के 
भोजन का कुछ प्रबंध करें 
फिर छप्पन व्यंजन भोग से पहले 
आओ हम दीप जलायें !
.
किसी दरिद्र दुखी अधनंगे के 
तन ढंकने का यत्न करें 
फिर नूतन धवल परिधान पहन 
आओ हम दीप जलायें !
.
संतप्त स्वजन परिजन पीड़ा से 
परजन  को भी ध्यान धरें 
फिर कर्णभेदी आतिश के संग 
आओ हम दीप जलायें !
.
.....एवम् अपेक्षित हैं समालोचना/आलोचना के चन्द शब्द!

गुरुवार, 5 नवंबर 2015

पराये धर्म के अपने और मेरे अपने धर्म के पराये....?

स्वागत् है आपका SwaSaSan पर... एवम् अपेक्षित हैं समालोचना/आलोचना के चन्द शब्द...

पराये धर्म के अपने और मेरे अपने धर्म के पराये....?


 मेरे अपने तो मेरे दिल में बसा करते हैं
फिर अपनों के अपने दूर कैसे रहते?
मेरे अपनों में परिजन से प्रिय हुए
मेरे - कुल, जाति, धर्म, घर, मोहल्ले, शहर, प्रांत, देश...
और पूरी दुनियां के लोग
मैं विस्तृत हुआ धीरे-धीरे
मैं से 'हम-दोनों' में
फिर 'हम-चार' से 400 में, 4,00,000 में
फिर बढ़ते-बढ़ते
कुछ करोड़ मेरे धर्म के
दुनियां भर में फैले हुए लोगों तक
विस्तृत हुआ मैं
गैरों से अपनों के हक की लड़ाई मेरा मकसद बना
एक बार
मेरे अपनों की सीखों पर
एक गैर से वाद-विवाद हुआ
उसने पूछा कि -
क्या तुम्हारे लोग तुम्हारे अपनों की
सीखों पर ही चलते आये हैं ?
क्या कंस, रावण, हिरणाकुश तुम में से एक ना थे?
क्या रावणों, दुर्योधनों के ज्ञात-अज्ञात कुलवंशज
तुम्हारे बीच नहीं हैं आज ?
या खुद तू जो इतना बलबला रहा है
इनमें से किसी का खून नहीं कैसे कह सकता है?
मैं मौन हो सिर झुकाये सुनता रहा....
मन ही मन गुनता रहा ...
मेरे रावण, कंस, दुर्योधनों से
बहुत ऊपर हैं
महान हैं
वे गैर जिन्हें जाना नहीं अबतक मैंने!!!
अब लगता कल तक
मैं
शायद अखिल ब्रम्हांड में
व्याप्त हो जाउंगा
सबमें स्वयं को
और स्वयं में सबको पाउंगा.....
‪#‎सत्यार्चन‬

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