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शुक्रवार, 25 फ़रवरी 2011

ऐ आतंकवाद...

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ऐ आतंकवाद...
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ऐ मेरे देश में घुस आये आतंकवाद

तुम चले जाओ

मेरा देश छोड़कर

भ्रम है तुम्हारा

कि सफल हो जाओगे

इसे टुकड़ों में तोड़क

तोप! गोले! राकेट! गोली से

क्या ले जाओगे

बस दे पाओगे

मांस के लोथड़े ! तड़पते शरीर ! चंद लाशें !

तोड़ पाओगे मकान स्मारक और पुल

किन्तु ना जीत पाओगे कभी

मानवता से

भाईचारे से

देर सबेर

तुम्हारा भी हश्र

होना है वही

जो इतिहास में हर आतंक का

होता आया है

अंतिम चीख

अंतिम लाश

तुम्हारी रही है

तुम्हारी ही रहेगी

भ्रम में मत रहो

हमारे होंसलों से टकराओगे

तो मिट्टी में मिल

मिटटी हो जाओगे 

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