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शुक्रवार, 25 फ़रवरी 2011

प्रेम की गागर से प्रेम-सागर तक

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श्रीमद्भागवद्गीता में जो कर्म फल की इच्छा बिना कर्म के लिए कहा गया है
वही प्रेम के बिषय में भी सार्थक है .
प्रेम केवल देने के लिए होता है पाने की इच्छा किये बिना !
जब ऐसा प्रेम दिया जाना संभव हो जाता है
तो
प्रेमसलिला का उद्गम होता है .
फिर प्रेम का सागर भी बनता है
.जब प्रेम सागर का रूप ले लेता है तो प्रेम सागर में


क्रोध , ईर्ष्या, आशंका, अदि के पत्थर केवल क्षणिक उथल पुथल उत्पन्न कर पाते हैं
किन्तु प्रेम सागर में आनंद की लहरें निरंतर उद्वेलित करती रहती हैं .
प्रेम सागर ना भी बना हो तो प्रेमसलिला भी ऐसे पत्थरो से प्रवाहहीन नहीं होती
किन्तु यदि प्रेम के कटोरे में / गाघर में पत्थर लगे तो असर होता है .
अब यह आपके प्रेम की प्रगति पर निर्भर है कि कितना फर्क पड़े .
जहाँ तक प्रेम में क्रोध, ईर्ष्या , एकाधिकार अदि के जन्म का प्रश्न है
तो
यह पूरी तरह मानव स्वाभाव के अनुकूल ही है .
जिससे प्रेम होता है उसपर एकाधिकार की इच्छा भी ,
प्रेम के प्रतिफल में प्रेम का मिलना सहज प्रतिक्रिया है
और ऐसा होता भी है हाँ
कभी कभी प्रेम का प्रतिफल कम मिलता अनुभव होता है
किन्तु यह सत्य नहीं होता
भ्रम मात्र होता है .

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