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सत् दर्शन

 स्वसासन आपकी प्रतिक्रियाओं के स्वागत को प्रतीक्षित है ....
चर्चित सुख के साधन

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मेरा ही नहीं, श्रीमद्भागवद्गीता, पाक कुरान ,द ग्रेट बाइबल , गुरु ग्रन्थ साहिब आदि धर्म ग्रंथों सहित

कई अन्य विद्वानों का सन्देश है

जिसे मैंने मेरे जीवन में उतारकर 

जीवन सरल व सुखी बनाने में सफलता पाई है ...

सारे रिश्तों, नातों, मित्रों आदि के प्रति कुछ भी करते समय

एक भाव जन्मता है कि मैं इसके हित साधन में सहायक हूँ

फिर अगले ही पल एक आस जगती है कि

इसे लगना चाहिए , इसे मानना चाहिए कि  

ऐसा मैं कर रहा / रही हूँ

मेरी आवश्यकता पर इसे भी ऐसा ही करना चाहिए ....

आदि.... आदि....

यही वे प्रतिफल की इच्छाएं हैं जो 

दुःख / कष्ट का कारण हैं .

हम किसी के भी प्रति {स्वयं अपने प्रति भी }

कुछ भी करते हुए यदि यह भाव रखें कि 

मैं ऐसा इसीलिये कर रहा/ रही  हूँ  कि

मुझे ऐसा करने की ईश्वरीय प्रेरणा मिली है

या मेरे विवेक अनुसार इस समय

ऐसा ही किया जाना उचित है

मैं केवल सद्भाव से अपना कर्त्तव्य कर रहा /रही हूँ

जरुरी नहीं कि इसका सबसे अच्छा /अच्छा ही परिणाम आये

हो सकता है इससे भी अच्छा कुछ हो सकता था

हो सकता है इसका परिणाम अच्छे के स्थान पर बुरा हो किन्तु

मेरे विवेक अनुसार मैंने अच्छे के लिए ही ऐसा किया

यदि इससे उसका बुरा भी हो तो मुझे आहत नहीं होना है

अच्छा हो तो इस बात के लिए घमंड ना कर आनंदित होना है कि

मुझे ऐसा अच्छा कार्य करने का ईश्वर ने अवसर दिया

जिसके प्रति मैंने किया उसके लिए ऐसा होना ही था

यदि मैं ना करता / करती तो भी उसके साथ ऐसा होना 

{अच्छा /बुरा } पूर्वनिर्धारित था .

बस यही निष्काम कर्म है

यही है नेकी कर दरिया में डाल

जब इस तरह का भाव जाग्रत होना संभव हो जाता है

तब कुछ नए अनुभव होते हैं

केवल सुख के अनुभव

थोडा और विचार कीजिये 

आप उनके लिए दुखी हो लेते हैं जिनके लिए आपने बहुत कुछ किया 

लेकिन वो आपके लिए बहुत कुछ / कुछ भी नहीं कर पाए

.

अब एक और बात सोचिये

उन लोगों के बिषय में सोचिये

जिन्होंने आपके लिए बहुत कुछ/ कुछ  भी अच्छा किया

शायद तुरंत बहुत कम लोग याद आयें किन्तु

थोडा जोर डालने पर थोड़े बहुत लोग याद आ ही जायेंगे

[ये तुरंत याद इसीलिये नहीं आ पाते हैं क्योंकि यह हमारा सामान्य

मानव स्वाभाव है. हम हमारे प्रति किसी के कुछ किये को

अधिक किया नहीं मानते .

यही उनके साथ भी होता है जिनके लिए हमने कुछ किया,

जो हमारे लिए महान लगता है 

लेकिन उसकी नजरों में उतना महत्वपूर्ण नहीं होता ]

जो लोग आपके ही अनुसार आपके लिए

कुछ हित संवर्धन का कारण बने

उनमें से कितनों को प्रतिफल में आप कुछ कर पाए .

कई ऐसे लोग आपकी लिस्ट में मिल जायेंगे

जिनके लिए अच्छे के प्रतिफल में आप उतना / कुछ भी

  अच्छा नहीं कर पाए होंगे / होंगी.

यहाँ तक कि कईयों को तो

आप कृतज्ञता तक प्रकट नहीं कर पाए होंगे /होंगी .

यही तथ्य उस समय ध्यान में रखना  चाहिए जब हम दूसरी ओर हों .

जिस तरह आप उनके लिए कुछ खास नहीं कर पाए

जिन्होंने आपके लिए किया उसी तरह वो आपके लिए नहीं कर पाते

जिनके लिए आपने कुछ खास किया 

किन्तु यह "अच्छा " होना निरंतर जारी है .

जरुरी नहीं प्रतिफल में वह व्यक्ति ही कुछ करे

जिसके लिए आपने कुछ किया. 

प्रतिफल में कहीं कोई और आपके लिए शुभ कर रहा होगा

जैसे बरसात में आप जब हाथ में छतरी लेकर चलते हैं

तब बरसात से आपको पूरी छतरी मिलकर बचाती है

जबकि आपके सीधे सम्पर्क में छतरी की केवल डंडी ही होती है.

आपका पूरा ध्यान पूरी पकड़ डंडी पर ही होता है

बरसात से बचाने वाले परदे की और आप देख भी नहीं रहे होते हैं

ऐसे ही जीवन यात्रा है

जिसमें दुःख / दर्द की बारिस हो रही है

और आपके हाथ में आपके " संचित " *** सद्कर्मों की छतरी है.

कभी यह बरसात सुहानी लगती है

कभी साधारण

कभी मुसलाधार बारिस के साथ आंधी भी चल रही होती है

तब हमारे हांथों में पकड़ी हुई मजबूत से मजबूत छतरी भी

हमें भीगने से बचा नहीं पाती

यह बरसात कभी कम होती है तो कभी ज्यादह

कभी क्षणिक तो कभी लम्बे समय के लिए

.......यही प्रकृति है.



*** संचित कर्मों से मेरा आशय आपके होश सँभालने से लेकर अभी तक के आपके कार्यों के अतिरिक्त

आपके पूर्वजन्मों के {यदि पूर्व जन्म में विश्वास हो },पूर्वजों के , कुल के ,परिजनों के कर्मों का निष्कर्ष है . 

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swasasan team always welcomes your feedback. please do.
प्रेम की गागर से प्रेम-सागर तक
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श्रीमद्भागवद्गीता में जो कर्म फल की इच्छा बिना कर्म के लिए कहा गया है
वही प्रेम के बिषय में भी सार्थक है .
प्रेम केवल देने के लिए होता है पाने की इच्छा किये बिना !
जब ऐसा प्रेम दिया जाना संभव हो जाता है
तो
प्रेमसलिला का उद्गम होता है .
फिर प्रेम का सागर भी बनता है
.जब प्रेम सागर का रूप ले लेता है तो प्रेम सागर में
क्रोध , ईर्ष्या, आशंका, अदि के पत्थर केवल क्षणिक उथल पुथल उत्पन्न कर पाते हैं
किन्तु प्रेम सागर में आनंद की लहरें निरंतर उद्वेलित करती रहती हैं .
प्रेम सागर ना भी बना हो तो प्रेमसलिला भी ऐसे पत्थरो से प्रवाहहीन नहीं होती
किन्तु यदि प्रेम के कटोरे में / गाघर में पत्थर लगे तो असर होता है .
अब यह आपके प्रेम की प्रगति पर निर्भर है कि कितना फर्क पड़े .
जहाँ तक प्रेम में क्रोध, ईर्ष्या , एकाधिकार अदि के जन्म का प्रश्न है
तो
यह पूरी तरह मानव स्वाभाव के अनुकूल ही है .
जिससे प्रेम होता है उसपर एकाधिकार की इच्छा भी ,
प्रेम के प्रतिफल में प्रेम का मिलना सहज प्रतिक्रिया है
और ऐसा होता भी है हाँ
कभी कभी प्रेम का प्रतिफल कम मिलता अनुभव होता है
किन्तु यह सत्य नहीं होता
भ्रम मात्र होता है .

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दौलतमंद! दब्बू,  दबंग या दिलवाले 
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 .
तथा कथित ' दबंग ' क्या वास्तव में  दबंग शब्द के योग्य  हैं ?
{आनर किलिंग के सन्दर्भ में दबंगों की करतूत उनकी कायरता की परिचायक है .ये इतने डरपोक होते हैं की इनमें ऐसे लेख पढ़ने तक का साहस नहीं होता .यदि आप भी उनमें से एक हैं तो आइये थोडा साहस जुटाएं और  चर्चा करें  कौन कहाँ गलत है  ?  मेरे नजरिये को पढ़कर आप भी सुधार पर सोचे  बिना नहीं रह सकेंगे  . यह वादा है मेरा, आपसे . बस पूरा लेख पढ़िये और सुधार  को  मौका दीजिए .}
विगत दिनों हुए और लगातार होते जा रहे 'आनर किलिंग ' के प्रकरणों
 को पढ़कर मेरे अपने आसपास घटित कुछ घटनाएँ याद आती हैं 
जिनमें किसी एक की नहीं जाने कितने संबंधितों की हत्या एक साथ कर दी जाती है जैसे-
                                                
मेरे पड़ौस में ३-४ मकान छोड़कर एक प्रतिष्ठित ,शिक्षित, प्रगतिवादी और उदार परिवार
खान साहब का भी रहता है . खान साहब के छोटे से सीमित परिवार में दो बेटे थे .उनका बड़ा बेटा जब महानगर में कॉलेज में पढ़ रहा था तभी उसे एक भली लड़की से प्रेम हो गया. चूँकि लड़की हिन्दू थी अतः  दोनों ने समाज से छुपकर विवाह कर लिया. खान साहब थोडा दुखी हुए किन्तु फिर उदारता दिखाते हुए बहु को  बेटी की  तरह अपना भी लिया. बहु को उचित सम्मान व स्नेह के साथ साथ धर्म परिवर्तन के लिए भी नहीं कहा गया. खान साहब का समाज उनसे ख़ासा नाराज हो गया किन्तुखान साहब ने समाज से अधिक अपने बच्चों कि ख़ुशी पर ध्यान देना उचित समझा किन्तु कुछ ही महीने यूँ हँसते हँसाते गुजरे होंगे कि एक दोपहर अचानक उस हिन्दू लड़की के पिता और भाई ने अपने १०- १२ शुभचिंतकों के साथ आकर हंगामा किया और 'खान साहब कि बहु ' को जबरन उठाकर  जीप में डालकर ले गए. खान साहब का समाज तो पहले ही नाराज था सो खान साहब हाथ मलते रह गए . कुछ दिनों बाद बहु की ओर से लड़के पर अपहरण व बलात्कार का केस दर्ज कराया गया ,उस लड़की यानी खान साहब की बहु का कहीं ओर  किसी  सजातीय 'वर' से विवाह {अंतिम संस्कार }कर दिया गया .खान साहब का  बेटा मनोचिकित्सक का ग्राहक बन गया, खान साहब का हँसता खेलता परिवार बेटे के सच्चे प्रेम
और खुद  उनकी उदारता की भेंट चढ़ गया.
{कई शर्माजी , वर्माजी , खन्नाजी की कहानी भी इस सच्ची घटना जैसी ही होती हैं }

वास्तव में समस्या का मूल हमारी अधकचरी मानसिकता है.
हमें  हमारे स्थापित सामाजिक मूल्यों में पश्चिम का
आधा अन्धानुकरण तो गौरवान्वित करता है
किन्तु
आधे से थोडा अधिक अनुसरण शर्मिंदा कर देता है .
आज हर किसी आम ओ खास को अपने बेटे बेटियों के उत्तम भविष्य को ध्यान में रखकर 
शिक्षा  के लिए और शिक्षित होने पर नौकरी के लिए  अपने गाँव / कस्बों 
से बाहर शहर भेजना ही होता है . कभी कभी तो विदेश भी ! 
हर कोई मजबूर है चाहे वह रूढ़िवादी दबंग हों या 
प्रगतिवादी .

 अधिकांश पढ़ने वाले  बच्चे बिना कोई 'गुल' खिलाये अपनी शिक्षा पूरी कर अपने परिवार की शान में
चार चाँद लगाने में सफल रहते हैं. 
कुछ अपना प्रेम पाकर सफल वैवाहिक जीवन जीने में  
किन्तु कुछ, ऐसे दुर्भाग्यशाली होते हैं
कि उनके जीवन में प्रेम दिखावे के रूप में
अभिशाप बनकर आता है. 
फिर चाहे वह दिखावा उनके जन्म से लेकर युवावस्था 
तक उनके माता पिता की ओर से रहा हो
या यौवन के  क्षणिक आकर्षण के रूप में  या उनके प्रेम को ना समझ
पाने की कमजोरी का फायदा उठाने की कोशिश करने वाले  किसी  छलिया की ओर से .....
हमने आधा अधूरा आधुनिकता का अन्धानुकरण कर रखा है अन्यथा हमारी
भारतीय संस्कृति के पुरातन{?} प्रचलन मैं  संतान  के सयाने होते ही उचित वर/वधु  खोज विवाह देने की व्यवस्था थी.
विशेष परिस्थितियों में ब्रम्हचर्य के पालन की आवश्यकता की  दशा में
विशेष  इयम, नियम, संयम,आहार, विहार, 
प्रत्याहार भी सुझाये गए थे .
जिनमें छात्र-छात्राओं {एवं विधवाओं-विधुरों}  को सर मुंडवाना,योग-ध्यान व् 
व्यायाम करना , तेल मसाले रहित सादा भोजन करना , सादे वस्त्र पहनना,
  दर्पण ना निहारना , श्रृंगार एवं नर्म बिस्तर का निषेध ,अल्प निद्रा 
आदि ब्रम्हचर्य पालन में सहायक  सख्त नियम प्रस्तावित थे.
जबकि आज के विद्यार्थी विशेषकर 
संपन्न घरों के { दबंगों के} बच्चे  इन नियमों के ठीक उलट रहन सहन के आदि होते हैं.
सम्पन्नों को अपनी 
संतानों का ऐसा विपरीत आचरण गौरवान्वित करता  है.
जबकि आप भी अच्छे अंकों से उत्तीर्ण होने वाले 
विद्यार्थियों में सादगी पसंद व अनुशाषित  विद्यार्थियों का प्रतिशत ही अधिक पाते होंगे. 
विकास की प्रक्रिया में  परिवर्तन का सहज अंगीकार होना ही चाहिए
. कोई और विकल्प दिखता ही नहीं .
इस  प्रगतिवादी युग में ना तो संतान को  सयाने होते ही विवाह देना उचित है  और ना ही ब्रम्हचर्य 
हेतु सुझाये गए नियमों का  पालन करवाना संभव .

अतः इस प्रगतिकारक युग में हमें भी या तो परिवर्तित होने तत्पर रहना होगा
या थोडा संयमित ! थोडा सीमित !
क्योंकि आज के प्रतिस्पर्धी समय में  किसी भी आय वर्ग के पालक अपनी कन्या का १८ वर्ष की आयु में विवाह करना भी चाहें  तो उचित वर कहाँ से लायें ? हर विवाहोच्छुक युवा {युवक व युवती दोनों को ही }को  कार्यरत और  उच्च शिक्षित जीवनसाथी  
की ही  तलाश रहती है  और भी अनेकों कारण हैं कि आज के समय में विवाह की आयु २५ से ३५ वर्ष के
बीच रहती है .जबकि इस  प्रगत समाज में अच्छे  खानपान , अखवार, टी व्ही,  कंप्यूटर आदि  उन्नत 
शिक्षाप्रद व मनोरंजक साधनों के कारण {यौन} परिपक्वता  की आयु और भी घट गई है.
{ यह बताना तो जरुरी नहीं ही है कि बेटे- बेटी के सयाने होते ही विवाह करना इसलिए 
आवश्यक नहीं  सुझाया गया  कि अब वे अधिक खाना खाने लगेंगे } .
ऐसे में सहज ही स्वस्थ अथवा विकृत  विपरीत यौनाकर्षण का जन्मना प्रकृति अनुरूप व स्वाभाविक है .विशेषकर घर से बाहर रह रहे युवाओं के लिए  विपरीत लिंगी की स्वच्छंद उपलब्धता कभी कभी सुविधाजनक / परिस्थिति जनक सामीप्य / यौनाकर्षण  के अवसर ले आती है .ऐसे में यदि वे प्रेमी युगल विवाह जैसे पवित्र बंधन में बंधने स्वतः तैयार होते हैं तो उनके इस निर्णय का स्वागत किया जाना चाहिए .यह मात्र एक सहज स्वाभाविक घटित है .

  ऐसी दशा में   एक सच्चा मित्र ही अच्छा मार्गदर्शक हो सकता है.समझदार माता- पिता अपनी संतान के सबसे सच्चे मित्र होते हैं. अधिकांश सफल व्यावसायिक और वैवाहिक जीवन जी रहे युवाओं के माता-पिता उनके अच्छे मित्र पाए जाते हैं, जो उनके पहले जिज्ञासु  प्रश्न से लेकर उनकी हर शंका / कुशंका के समाधान में, उन्हें राह सुझाने में अपनी सर्वोत्तम क्षमता का उपयोग करते हैं. उनकी सफलता के पीछे बड़ा कारण उनके माता-पिता का उचित मार्गदर्शन भी होता है. सम्भ्रान्त परिवारों में पल रहे युवा अक्सर अपने माता-पिता से अपने युवा साथियों के बिषय मैं हर छोटी बड़ी  बात शेयर करते रहते  हैं.उनके बीच  कोई आकर्षण जन्मता है या कोई अनचाहा हमउम्र अकारण निकट आने की कोशिश कर रहा होता है तब वे अपने बड़ों से बेखौफ सलाह मशवरा करने की स्थिति मैं होते हैं . ना तो उन्हें अपने खुद अपने  ना ही उस चाहे/ अनचाहे साथी के खूनखराबे का डर होता है . क्योंकि उनके माता-पिता सभ्यता के दायरे में रहकर ही  ऐसी समस्याओं/ अवसरों में निराकरण सुझाते / निकालते  हैं . वे निःसंकोच  हर परिश्थिति में अपनी संतानों के  सर्वोत्तम मार्गदर्शक होते हैं .  यदि आवश्यक व उचित हुआ तो संभ्रांत परिजन उनके प्रेमी को स्वीकारने भी तत्पर रहते हैं . समाज में उन्हें भी अकारण सामजिक विरोध जैसी  समस्याओं का सामना करना होता है किन्तु उनमें  ' पराये ' समाज के स्थान पर अपने परिजनों का साथ देने का साहस होता है . 
इसके ठीक उलट तथाकथित दबंग ऐसे बिषयों पर अपने सामने अपनी संतानों का मुंह खोलना भी अनुचित समझते हैं .अधिकांश प्रेमविवाहों की असफलता के पीछे भयवश अपने अभिभावकों का मार्गदर्शन ना ले पाना भी है .  मजे कि बात यह है कि आप मैं से जो  तथाकथित दबंग हैं, आपने अपनी जिस संतान के जन्म पर उत्सव किये , स्वयं से अधिक उसकी ख़ुशी का ध्यान रखा ,उसकी हर उचित /अनुचित मांग पूरी करते रहे,किन्तु उसकी जीवनसाथी चुनने की इच्छा आपको इतना कठोर बना देती है कि आप अपनी दबंगता का उपयोग अपने ही अंश के विरुद्ध करने तत्पर हो जाते हैं .क्योंकि आपको सबल समाज का सामना करने की अपेक्षा अपनी संतान, जो आपके सामने निरीह है , का दमन करना आसान रास्ता होता है . तभी तो अपनी बेटी या अपने बेटे की प्रेमविवाहित पत्नी के गर्भाधान के उपरांत भी उसके विवाह को मान्यता देने  के स्थान पर गर्भसमापन का आदेश व आपकी  दबंगी के  अनुरूप  {?} {पुनः } विवाह का त्वरित निर्णय कर प्रयास प्रारम्भ कर देते हैं.या अपने उचित लालन पालन व मार्गदर्शन की असमर्थता की सजा अपने ही अंशों को अपने हाथों मौत देकर ,  दे डालते  हैं .आप अच्छी तरह जानते हैं कि समाज कितना भी सबल हो कितना भी प्रबल सामाजिक  विरोध हो ,सदैव क्षणिक होता है .जैसे जैसे समय बीतेगा लोगों का विरोध ठंडा पड़ता जाएगा .आप अपनी दबंगी का उपयोग अपनी संतानों के उचित प्रेम के समर्थन में भी कर सकते हैं . किन्तु आपकी  दबंगी का उपयोग आप केवल निर्बलों पर ही करना जानते हैं . आपमें वह साहस ही नहीं कि आप अपनी युवा संतानों के प्रेम प्रसंग के  उचित होने की सम्भावना पर विचार कर सकें .बड़े दुर्भाग्यशाली होते हैं वे लोग जो युवा होते होते अपने माता-पिता के स्नेह से धीरे धीरे वंचित  होते जाते हैं .आपके संस्कारों की ही कमी होती है कि आपकी संतान आपके डर से चोरी छुपे छोटे छोटे से शुरू कर बड़े अनैतिक काम करने लगती है .
आप हद से अधिक डरपोक और  स्वार्थी होते हैं अपना स्वार्थ सिद्ध करने के लिए अपना कुछ भी दाँव पर लगाने तत्पर रहते हैं . अपनी संतान भी !

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