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शुक्रवार, 25 फ़रवरी 2011

मकान और घर

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कूलर ए सी का आनंद लेते हुए

भूल चुके हैं हम

कमरे की खिड़की से आती

वो मीठी बयार
.

रूम स्प्रे की गंध भरे नथुनों में

भूल चुके हैं

आँगन की बगिया से उठती

वो भीनी -भीनी गंध
.

बस स्टाप के शेड तले

ताकते एक दुसरे की सूरत

भुला बैठे हैं हम

वो बूढ़े बरगद की

शीतल छाँव
.

पानी पाउच ने भुलाया

पनिहारिन से मनुहारकर

बुझाना अपनी प्यास
.

कृत्रिमता की दौड़ में

हम इतने कृत्रिम हुए जा रहे हैं

कि

ईंट गारे से बने मकान को

घर कहे जा रहे हैं
.

इसीलिये घर नहीं बस पा रहे हैं

एक ही चारदीवारी में बंद परिजन

एक दूजे को

अजनबी पा रहे हैं 

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