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सोमवार, 11 अप्रैल 2011

अन्नाजी; जय हिंद !!!

 आश्चर्य है अन्नाजी सरकार की एक और चाल में फंसकर खुश हो रहे हैं !
वह भी केजरीवाल जी और किरणजी जैसे सहयोगियों के होते हुए !
विगत ४ अप्रैल को भी अन्नाजी के अनशन समापन वाले दिन मैंने नीचे प्रदर्शित लेख लिखा था जो अक्षरसः सामने आ रहा है उसी तरह आज फिर लिख रहा हूँ ! अन्नाजी खुश होने लायक सरकार कुछ नहीं करने जा रही है वरन मेरे पिछले लेख के अनुसार ही सरकार की अगली चाल है यह जिसपर आप वेवजह प्रसन्न हो रहे हैं !
सरकार ने सभी राजनैतिक दलों और राज्यों के मुख्मंत्रियों की बिल पर रायशुमारी की मंशा एक सोची समझी साजिश के तहत जाहिर की है !
भारतीय राजनैतिक इतिहास गवाह है ना किसी भी विपक्ष ने कभी  सात्ताधारी दल के [ सरकारी ] और ना ही सरकार ने विपक्ष के [गैरसरकारी ] किसी भी उपयोगी से उपयोगी बिल को, बिना अनावश्यक बहस या बिना मनमाने गैरजरूरी संशोधनों का  दबाव बनाए, कभी पारित करवाने में रूचि दिखाई तो आज इतने महत्वपूर्ण बिल जिसपर कई राजनीतिज्ञों का भविष्य ही दांव पर लगने वाला हो को ऐसे ही छोड़ देंगे !
पिछले ४२ सालों से भी इन्हीं राजनैतिक दलों के झूठे / सच्चे विरोध / संशोधन प्रस्तावों के चलते लोकपाल बिल अटका रहा है तो अभी भी कम से कम ७-८ साल अटकाने का प्रबंध तो सरकार ने कर ही लिया है !
और भी मजे की बात यह कि मुद्दे को उठाने वाले अग्रणी नेता अन्नाजी की ख़ुशी ख़ुशी हामी भी भरवा ली !
अन्नाजी काश मुझे भी आपके सलाहकार मंडल में शामिल किया होता !
मैं आप जैसा नामी गिरामी नेता तो नहीं किन्तु विगत २१ सालों से भ्रष्टाचार के विरुद्ध कार्यरत हूँ ,और  एक एक दुह राजनैतिक चाल को बारीकी से देखते देखते अगले २१ सालों की इनकी रणनीती आज ही देख पाने में सक्षम हो गया हूँ ! 

[ विगत ४ अप्रैल ११ को नीचे दी गई लिंक प्रस्तुत की थी ] 
यह जीत नहीं भुलावा  है -अन्ना जी ,केजरीवालजी,किरण जी !
अन्नाजी के अनशन और केजरीवाल जी ,किरण जी के प्रयासों से सरकार झुकी हुई प्रतीत हो रही है किन्तु यह पूरी तरह सच नहीं है .
यदि माननीय मनमोहन जी जैसे नेताओं के हाथ में होता तो लोकपाल बिल ४२ वर्षों तक इन्तजार ना कर रहा होता .
कांग्रेस में ही नहीं देश के राजनैतिक इतिहास में मनमोहन जी , अटल जी , राजीव जी ,आडवानी जी जैसे नेता गिने चुने ही हुए हैं. सब के सब सत्ता के भागीदारों से सहयोग के बदले उनके अनैतिक की अनदेखी करने विवश!

ऐसे नेताओं को लोकपाल जैसे बिल से व्यक्तिगत फर्क नहीं पड़ता किन्तु लोकतांत्रिक सरकार अकेले एक व्यक्ति की नहीं होती .
यह कांग्रेस की मुख्य नीति तुष्टिकरण का प्रयोग मात्र है !
अभी चन्द दिनों पहले की मिश्र की क्रांति जनता के मन में ताज़ी हैं इस बात से सरकार भली भांति परिचित
और आशंकित भी थी इसीलिये अधिक देरी अधिक क्षति को समझते हुए सरकार के सलाहकारों ने समिति के गठन जैसी मांग मानने में कोई बुराई नहीं समझी होगी .
सोचा गया होगा कि जो बिल ४२ साल तक ठन्डे बसते में रखा जा सकता है उसके प्रारूप के नवीनीकरण में ४२ माह निकालना कौन सी बड़ी बात होगी ! फिर भारतीय ही नहीं कहीं की भी जनता एक से दूसरी बार इतने जोश के साथ सामने नहीं आ पाएगी ! बात आई गई हो जायेगी और फिर अगले चुनाव के बाद हमारी सत्ता रही तो तब तक हमारे दिग्गज इस मुद्दे को भुनाने का कोई ना कोई तरीका डूंड ही लेंगे ! तब तक अन्ना को सँभालने का रास्ता भी निकाल ही लेंगे !
किन्तु ....ईश्वर करे मेरे कयास मेरे साथ साथ सरकार के लिए भी कयास ही साबित हों और भ्रष्टाचार के विरुद्ध देश में राजनैतिक पहल का श्रीगणेश / बिस्मिल्ला हो !
किरण जी जैसे व्यक्ति को स्वसासन अपने अध्यक्ष के रूप में देखना चाहेगा ! किरण जी क्रांतिकारी जैन मुनि श्री तरुण सागर जी के दर्शन के समय भोपाल प्रवास के समय दिए राजनीती से दूर रहने के वक्तव्य के बाद शायद मुनिश्री द्वारा ' स्वसासन ' से परिचित कराई गईं थीं.     

1 टिप्पणी:

बेनामी ने कहा…

chittransh ji ,
aakhir aapki aashanka sach honi shuru ho gai

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