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बुधवार, 6 अप्रैल 2011

लघु कथा-१ सपनों का घर

स्वसासन आपकी प्रतिक्रियाओं के स्वागत को प्रतीक्षित है ....
सपनों का घर

एक सामाज सेवी संस्था के बुलाबे पर दिल्ली जा रहा था.

शाम के ५ बज रहे थे .
शयनयान श्रेणी के डिब्बे में सहयात्री अपने आप में खोये शून्य से बैठे थे .
मेरे सामने खिड़की से लगकर उनींदी सी एक बृद्धा बैठी थी और
मेरे बाजु में खिड़की पर उसके बृद्ध पति किसी पत्रिका के पन्ने पलट रहे थे.
अचानक बृद्ध ने पत्रिका को बंद कर बगल में रख एक लम्बी सांस खीची और
चश्मा उतारकर साफ़ किया फिरसे पहना और खिड़की के बाहर झाँकने लगे .
थोड़ी देर बाद खिड़की के बाहर सूखे खेतों की तरफ देखते हुए बृद्ध ने उत्साह पूर्वक
बृद्धा की और देखकर लगभग चिल्लाने वाले अंदाज में कहा

"देखो वो वहां जो मकान दिख रहा है ना ....."

" कैसे दिखेगा मेरी आँखें में रौशनी तो हैं ही नहीं और चश्मा भी तो ..... " बृद्धा ने बात काटते कहा और अपनी बात आधूरी छोड़ दी .
बृद्ध का उत्साह थोडा कम हुआ लेकिन झट अपना चश्मा उतार बृद्धा की बढ़ाते हुए
" लो मेरी नजरों से देखो....ऐसा ही होता ना हमारा सपनों का घर .. वो वहां ..."
बृद्धा ने जल्दी से चश्मा लेकर पहना और खिड़की से बाहर बृद्ध की इंगित की हुई दिशा में देखने लगी .
बृद्धा के चेहरे  पर एक पल के लिए चमक आयी और फिर वही पहले सा निराशा का भाव उभर आया .
"सारी उम्र तुम्हारी ही नजरों से तो दुनियां देखती आयी हूँ मगर हमारा सपनों का घर ना देख सकी "
बृद्धा ने चश्मा उतार कर वापस करते हुए कहा .
मैं बृद्ध दंपत्ति को और उनके आपसी स्नेह को देख ही रहा था की बृद्धा के इन शब्दों ने मुझे हिला कर रख दिया ......

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