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शुक्रवार, 8 अप्रैल 2011

एक तल्ख़ कहानी -आ अब लौट चलें.....

स्वसासन आपकी प्रतिक्रियाओं के स्वागत को प्रतीक्षित है ....

वह दिखने मैं ठीकठाक ही था
लेकिन यह उसकी अपनी सोच थी
सच यह था की जितना वह दिखने में आकर्षक था
उससे कई गुना व्यवहार में
हुनर मंद इतना की किसी भी मॉडल की कार की इमरजेंसी सर्विस में पूरे शहर में प्रसिद्द
शहर के नंबर एक वर्कशाप का हैड मैकेनिक
उसके आकर्षक व्यक्तित्व से मालिक से अधिक उसकी पूछ परख थी
फिर चाहे कार मालिक महिला हो या पुरुष
सबका चहेता था वो दोस्ताना था सबसे उसका
एक दिन उसकी एक महिला दोस्त ने उसे
उसके हुनर का असल पारिश्रमिक पाने खाड़ी देशों में रोजगार की सलाह दी
मार्गदर्शन रुपी सहायता भी की, उसके परदेश में रोजगार पाने और उसे वहां पंहुचाने में
और चला गया वो अपना असल मोल पाने ...
पहली बार डेड़ साल बाद वापस आते हुए वह सोच रहा था
' काफी कमा लिया इन डेड़ सालों में ...बस डेड़ साल बाद बांड ख़त्म होते ही वापस अपने देश लौट आउंगा ....
अगले डेड़ सालों में इतना पैसा इकठ्ठा हो जाएगा कि अपना गैराज खोल सकूँ ..'
इसी तरह के ख्यालों में खोया था कि रिक्शा घर को पंहुंचने वाली गली तक पंहुच चूका था
दूर से देखा उसके किराये के मकान की पहली मंजिल पर बालकनी में कोई रंगीन दुपट्टा हिलाकर उसी की ओर मुखातिब है
एक ही नजर में ४०-५० मीटर दूर से पहचान भी लिया ...पहचानता क्यों नहीं आखिर बीबी थी उसकी
रिक्शे पर खड़े होकर उसने भी पूरे उत्साह से हाथ हिलाते हुए ख़ुशी जताई
बीबी के बगल में ही दोनों छोटे बच्चे भी थे
ख़ुशी से झूमते हुए
बड़ा बेटा दौड़कर उसी की दिशा में उछलते कूदते चला आ रहा था.
रिक्शा घर तक पंहुच चूका था
नीचे सीढ़ियों के पास ही आँखों में आंसू भरे माँ और मुस्कुराते पिताजी भी मिल गए
जीवन में पहली बार अपना परिवार इतना खुश खुश देखा था उसने .
खैर, सबसे मिलजुलकर सबके तौह्फे सबको सौंपकर
परदेश के किस्से कल सुनाने का बहाना कर
जैसे तैसे बीबी के साथ एकांत पा सका
बीबी की ख़ुशी सबसे ज्यादह थी
परदेश के दुःख सुख जानने की इच्छा और अधिकार भी सबसे ज्यादह ....
और सारी बातों के बीच बीबी ने कटाक्ष करते हुए पूछ डाला
'' वहां भी आती हैं क्या मेरी सौतें "
'' हाँ कुछ औरतें आती तो हैं मगर उनकी ओर आँख उठाकर देखने की भी हिम्मत नहीं होती "
'' क्यों ? "
'' वहां का क़ानून बहुत शख्त है किसी ने झूठी शिकायत भी कर दी तो भी कोड़े मारने से लेकर संगसार वाली मौत की सजा तक मिल सकती है "
घबराकर '' ए मालिक इनको बचाए रखना हर बला से..... कभी ऐसा दिन ना दिखाना ...." अगले ही पल शरारत से '' वैसे अच्छा ही है तुम मर्द लोग भरोसे के काबिल होते नहीं ...इस बहाने मुझे सबर रहेगा .."
'' हाँ चल ठीक है.. तू ऐसे खुश तो ऐसे ही सही... वैसे औरतें तो वहां भी औरतें ही होती हैं ..."
'' मतलब ? "
'' कुछ नहीं डेड़ साल निकल गए हैं बाकी डेड़ साल का बांड बचा है फिर लौटकर यहीं अपना छोटा सा गैराज खद के मकान में खोल लूंगा ....हमेशा तेरी नजरों के सामने ही रहूँगा... फिर ये भी देख लेना कौन पहले बेईमान होता है आदमी या औरतें ? " मुस्करा रहा था वो .
'' वो सब तो ठीक है मगर यहाँ अपने खुद के गैराज से वहां के बराबर आमदनी आएगी क्या ? ...बच्चे बड़े हो रहे है....अब अंग्रेजी स्कूलों में पढ़ने जाने लगे हैं तो उनकी जरूरतें भी बड़ी होती जा रही हैं ..........मगर तुम आ जाओगे तो सब ठीक कर लोगे ..."
कुछ आश्चर्य और संतोष के साथ देखता रह गया वह पत्नी की ओर ''......."
हंसी खुशी के माहौल में कब छुट्टी के दिन ख़त्म हुए पता ही नहीं चला
आज लौटते हुए ऐसा लग रहा था अभी अभी कुछ घंटे पहले ही तो वह आया था .
कम से कम डेड़ साल और सबसे दूर रहने की मजबूरी के और परिवार के भविष्य के सुधरने की उम्मीद के साथ उसे लौटना पडा .
लौटते हुए परदेशी ग्राहकों के साथ साथ ' इशरत ' का ख्याल भी आया अजीब लड़की है चाहे जब गाडी लेकर दनदनाती हुए चली आती है सीधे उसकी ओर ..वो गैराज में कहीं भी हो ...अब तो सामने आते ही चेहरे से आधा नकाब हटा आँखों में आँखें डाल गाडी में बेमतलब के नुक्श ढूँढने को कह परेशान करती रहती है ...कहीं कोई और तो कोई नुक्श नहीं ? ... अब उसे उसकी मर्जी में ही नुक्श नजर आने लगा था . उसे उसकी वही शख्शियत दुश्मन सी लगने लगी जिसपर उसे खुद नाज था .
जैसे तैसे डेड़ साल और बीता और दिल ने राहत की सांस ली
इस रेगिस्तानों के देश को छोड़ने के साथ साथ उसकी जिन्दगी में हसरतो की हरियाली की फसल उगने वाली थी और ' इशरत ' की दादागिरी से छुटकारा . पागल थी इशरत . चाहे जब चाहे जो फरमान सुना मानने पर मजबूर कर देती थी उसे .कई बार तो झूठा इल्जाम लगाने की धमकी भी दे चुकी थी . अपने वतन वापस लौटने का इरादा घर फोन पर बताने के अलावा और किसी को भी नहीं बताया था
उसने .चुपचाप अपने वतन को वापसी .
अपने वतन लौटने की ख़ुशी और उत्साह वही महसूस कर सकता है जो लम्बे समय बाहर रहा हो. वो लौटकर मुंबई अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे पर उतरा तो पता चला आज मुंबई बंद है टेक्सियों और बसों की हड़ताल भी है. जैसे तैसे रेलवे स्टेशन पंहुचा तो उसकी ट्रेन छूट चुकी थी .
लोकल पकड़ शहर के बाहरी स्टेशन तक पंहुचा. कारण था उसका एक खास दोस्त वहां रहता था. जिससे कार मांग सकता था वो .क्योंकि अगली ट्रेन ९ घंटे बाद थी और उसकी समझ से उसके परिवार वाले पिछली बार की तरह बिना ट्रेन के लेट होने की परवाह किये एक दो घंटे पहले से ही उसकी राह में अपनी अपनी आँखें बिछाए बैठे होंगे.
दोस्त से मिल बड़ी गर्मजोशी से परिवार के सदस्यों की बेसब्री का जिक्र किया और हमेशा के लिए लौटने की खुशखबरी भी दी . दोस्त से कार मिल गयी और उसका सुहाना सफ़र शुरू हो गया .१४ घंटे की ड्राइव के बाद अपने शहर पंहुचा .सड़क का रास्ता सीधा होने और ड्राइविंग में मास्टरी होने के कारण छूटी हुई ट्रेन के टाइम से बस १ घंटा देरी से पंहुच गया घर...सब के सामने .आज बालकनी में खड़े नहीं मिले कोई . शायद ट्रेन का टाइम निकल चुका इसलिए निराश हो गए होंगे सब .
यही सब सोचते हुए उसने घर के अन्दर प्रवेश किया .
माँ दरवाजे पर ही मिल गई. ऐसे स्नेह से हाथ पकड़ अन्दर लेकर आयी जैसे वह बच्चा हो.
अन्दर आकर देखा , उसके भेजे पैसों से घर का हुलिया ही बदल गया था उसे अपना खुद का ड्राइंग रूम शाही नजर आ रहा था .
माँ की आवाज पर अन्दर से बीबी पानी का गिलास लिए आती दिखी . आते ही बोली
''इन्तजार करते करते अब्भी बालकनी से अन्दर आयी हूँ. "
पहले से भी पाँच साल कम उम्र की दिख रही थी वो , कहीं अधिक खूबसूरत ...
'' और बच्चे ? "
'' सब अपने अपने काम में लगे हैं एक्जाम सर पर हैं ना ! "
उसे वो जितनी खूबसूरत लगी उतनी सभ्य भी शायद वैभव का असर था .
फिर सबके तोहफे बांटे सबने थैंक्यू भी कहा मगर कहीं कुछ खालीपन सा लग रहा था .
इस बार थोडा आसानी से बीबी के साथ एकांत मिल गया .
बड़े उत्साह से स्थायी वापसी और भविष्य की प्लानिंग के बारे में बताने लगा .
बीबी हाँ हूँ में जबाब देती रही
वो समझ नहीं पा रहा था कि उसका परिवार जरा सी सम्पन्नता आते ही इतना औपचारिक कैसे हो सकता है उससे !
कहीं इस सम्पन्नता से जीने कि आदत के बाद पुनः संघर्षों से भयभीत तो नहीं उसके परिजन ?

आखिर उसने पत्नी से प्रश्न किया '' तुम्हें कहीं यह तो नहीं लग रहा कि मुझे वहां काम पर वापस जाना चाहिए ? "
'' देखो मेरे लगने ना लगने कि बात नहीं है .....तुम यहाँ मेरे सामने ...मेरे पास रहोगे तो इससे बड़ी ख़ुशी की बात और क्या होगी मेरे लिए ?...मगर बच्चों की जिम्मेदारी भी तो कोई चीज है ... तुम खुद समझदार हो जो अच्छा लगे करो ..."
दूसरी ही सुबह वो अपना बैग तैयार कर रहा था . पत्नी ,पिता , माँ और बड़े बेटे सबने पूछा इतनी जल्दी वापस क्यों जा रहा है वो ?
उसने बताया सबके लिए तोहफे खरीदे जा चुके थे हवाई टिकिट भी हो चुका था तभी कंपनी ने छुट्टी देने से मन कर दिया था और सबको ज्यादह खुश देखना चाहता था इसीलिये एक दिन के लिए आ ही गया.... और वैसे ही कह दिया था की वापस नहीं जाना है .
लौटते समय दोस्त को गाडी वापस लौटाने गया तब दोस्त ने भी पूछा कि फिर से वापसी का इरादा कैसे कर लिया तो बताया
''जाना तो था ही बस मजाक कर लिया था सबके साथ ! "
और फ्लाईट में बैठे बैठे सोच रहा था अब अधिक दिन ' इशरत ' से दूरी बनाए रखने के और बहाने दूंदने होंगे.....

मगर जरूरत है क्या इसकी ...?.....?.....

1 टिप्पणी:

बेनामी ने कहा…

duniyan ka dstoor hi kuchh aisa hai !
jeene ki jarooraten poori karne jindgi se door jaana padtaa hai !

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