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शुक्रवार, 10 जून 2011

नेताजी और यमराज

(अतिथि रचनाकार संदीप कौशिक जी की प्रस्तुति )
नेताजी और यमराज


एक साथ कई घोटाले थे किए,
सो नेताजी ज्यादा दिन नहीं जिए |
उनका पाप का घड़ा जब यमदूत नहीं उठा पाये,
तो यमराज स्वयं चलकर उन्हें लेने आए |



यमराज बोले- चल तेरा समय हो गया पूरा,
उसने भी आँखें निकाल कर यमराज को घूरा |
जब यमराज ने आगे बोलना शुरू किया,
तो मौत देखकर नेताजी का मानो दम निकल गया |
यमराज बोले- दुष्ट ! अब तो धरती को छोड़ दे,
अपना पाप का घड़ा जाते-जाते तो फोड़ दे |



नेताजी बोले- तू कौन है और ये क्या बक रहा है,
और मुझे बलि के बकरे की तरह क्यों तक रहा है |
यमराज बोले- मैं मौत हूँ और तुझे लेने आया हूँ,
तेरे पापों का लेखा-जोखा भी साथ लाया हूँ |




नेताजी बोले- मेरे सामने आप ऐसे क्यों गरजते है,
भला मुझ जैसे राक्षस तो मारे नहीं मरते हैं |
दिन भर कहीं न कहीं जरूर घोटाला करते हैं ,
लोकतन्त्र के खेत में आवारा साँड की तरह चरते हैं |
कोई भी साबित करने की हिम्मत नहीं करता है,
जो करता है, वह बर्बादी का स्वाद जरूर चखता है |
चुनाव में “नोट लो, वोट दो” की नीति अपनाते हैं,
फिर गूंगी-बहरी जनता पर गुंडाराज चलाते हैं |
न आये सरकार अपनी, तो विपक्ष को सताते हैं,
खुद खाकर रिश्वत, लोगों में उनका नाम उड़ाते हैं |
कर-करके बायकाट अपनी हर मांग मनवाते हैं,
नहीं तो लोकतन्त्र में हर तरफ जातिवाद फैलाते हैं |
अब चलिये, मैं आपके साथ चलता हूँ,
बहुत उभर चुका घोटालों के पैमानों पर, अब ढलता हूँ |




यमराज सकुचाए, बोले- तुम तो मुझे भी मरवाओगे,
यमलोक में भी घोटाला करके मेरा नाम बताओगे |
तुम्हें तो नहीं मिलगा यमलोक, पर मुझसे भी छिनवाओगे,
फिर बैठे-बैठे यमलोक में भी गुंडाराज चलाओगे |
तुम कुछ दिन और ज़िंदा रह जाओ,
धरती पर ही अपना भ्रष्टाचार फैलाओ |
धरती पर ही अपना भ्रष्टाचार फैलाओ ||
धरती पर ही अपना भ्रष्टाचार फैलाओ |||
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