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शुक्रवार, 24 जून 2011

"हमारा राज देश पर तो देश का दुनियां पर"-4 ["वास्तविक स्वराज " ]

SwaSaSan Welcomes You...
  ["वास्तविक स्वराज " ]

देश में व्याप्त भ्रष्टाचार, कुशासन का सबसे काला पहलु है
 जिसके विरुद्ध कई जगह से आवाज उठाई जा रही है 
जिनमें से एक नक्सल भी हैं .
नक्सलवाद का प्रारंभ भ्रष्टाचार के विरुद्ध जनांदोलन के रूप में हुआ 
किन्तु हमेशा की तरह राजनैतिक नेतृत्व के प्रवेश के साथ 
यह आन्दोलन पथभ्रमित हो गया .
नक्सलियों का उद्देश्य यदि भ्रष्टाचार का खात्मा और विकास के मार्ग पर बढ़ना होता
और वे बन्दूक की बजाय सत्याग्रह जैसी गोली चलाते  होते 
तो स्वसासन भी उनके साथ होता .
स्वसासन भी देश से हर उस बुराई को दूर करने संकल्पित है
जो सामाजिक असमानता पैदा करती हो 
एवं किसी भी तरह विकास के मार्ग में बाधक बनती हो .
स्वसासन में शामिल होने की इच्छा रखने वालों को
सर्वप्रथम स्वयं पर शासन करना आना चाहिए .
जब तक आप स्वयं पर शासन करना नहीं जानते
आपको दूसरों पर भी अंगुली उठाने का कोई अधिकार नहीं बनता !
स्वयं पर शासन से केवल इतना आशय है कि
दूसरों का किया जाने वाला जो कार्य आपको पसंद नहीं है
उसे आप स्वयं भी ना करें और दूसरों को भी ऐसा ना करने प्रेरित करें .
 अपनी प्रगति का हर संभव ईमानदार प्रयास भरसक करें 
किन्तु किसी दुसरे की प्रगति में बाधक बनने का प्रयास ना करें 
ना किसी अन्य का हक़ छीनने का प्रयास करें ! 
 जैसे
आपको शिकायत होती है कि
पडोसी ने आपके घर के आगे गन्दा किया या कचरा फेंका किन्तु आप भी वही करते हैं
रह्गुजरों के अच्छी भली दीवार के गन्दा करने से आपको तकलीफ है 
मगर आप भी उसी दीवार पर थूक कर आगे बढ़ लेते हैं .  
आपको शिकायत है कि अमुक आफिस में रिश्वत देकर हर कुछ किया जाता है , 
आप रिश्वत देने के खिलाफ भी हैं
किन्तु
जब आपको अपना काम आसानी से या अयोग्य  होते हुए भी कराना होता है 
तो आप भी तुरंत रिश्वत की पेशकश कर ही देते हैं 
और मौका पाते ही रिश्वत लेना तो जैसे आपका जन्मसिद्ध अधिकार है .
सारे राजनैतिक दलों और राजनेताओं से आपको शिकायत  तो है
कि वे भ्रष्ट हैं किन्तु चुनाव के लोकलुभावन वादों के फेर में 
या अपने किसी छोटेमोटे काम को करवाने कि आश में 
आप उन्हें ही अपना बहुमूल्य वोट  और सपोर्ट देने तैयार हो जाते हैं
फिर भले ही चुनाव  प्रत्याशी कुख्यात अपराधी ही क्यों ना हो . 
आप केवल इस्सेलिये बिना सोचेसमझे वोट  करते हैं
कि मेरा एक वोट किसी को भी दे दिया जाए क्या फर्क पड़ता है ?
आपको अपनी सोच बदलनी होगी ! 
क्योंकि फर्क पड़ता है ! 
बहुत बड़ा फर्क पड़ता है ! 
आपके आत्मप्रेरित , आत्मनियंत्रित , आत्मनिर्णय से 
बहुत फर्क पड़ता है !!!
आप वोट डालने के लिए क़तार  में खड़े रहकर 
अपनी बारी आने का घंटों इन्तजार करने तैयार रहते हैं 
किन्तु उचित उम्मीदवार का निर्णय करने के उद्देश्य से 
सभी उम्मीदवारों के बिषय में जानने के लिए कुछ मिनट खर्च नहीं कर सकते ? 
आपकी समझ से आपका वोट व्यर्थ ना जाए 
इसलिए आप  किसी स्थापित राष्ट्रीय दल के उम्मीदवार को ही वोट करना उचित समझते  है 
क्योंकि उस दल की  सरकार  बनने की अधिक संभावना है
 भले ही उनका उम्मीदवार अपराधिक छवि वाला ही क्यों ना हो,
तो आपको अपनी सोच बदलने कि जरुरत है !
क्योंकि यदि आप अपने वोट से क्रांति लाना चाहते हैं
तो किसी भी आपराधिक छवि रहित,
उदारवादी, सुधारवादी उम्मीदवार
( निर्दलीय ही क्यों ना हो )
को वोट करना अगले ही चुनाव से प्रारंभ कीजिये !
ताकि उन संभ्रांत उम्मीदवारों को मिले वोटों की संख्या 
उन तथाकथित बड़े राजनैतिक दलों के आकाओं की आँखें  खोलने का कारण  बने 
जो येन-केन-प्रकारेण सत्ता पर अपनी पकड़ बनाए रखने के लिए 
अधिकांश अपराधिक उम्मीदवार 
या अपराधियों की सेना के संचालकों को अपना प्रत्याशी बनाते आये हैं .
वर्तमान सांसदों / विधायकों  में बिरले ही ऐसे होंगे जो स्वयं गुंडे ना हों / रहे हों 
अथवा जिनके प्रमुख कार्यकर्त्ता गुंडे ना हों . 
अभी तक की अवधारणा यही है कि बिना गुंडों के चुनाव जीतना
असंभव नहीं तो असंभव के समीप जरुर है .
हमें यह अवधारणा बदलनी ही होगी !
और यह हमारे ही हाथ में है !
अन्यथा हम हमारे ही लोंगों के गुलामी करते रह जायेंगे !
और अराजक तत्व देश को अराजकता का अखाड़ा बनाते रहेंगे !
 अधिकांशतः 
ऐसे निरंकुश तथाकथित लोकतंत्र (राजतन्त्र ) 
के विरुद्ध आवाज उठाने वाले की आवाज दवाने का 
हरसंभव प्रयत्न किया जाता रहा है 
आगे भी होता रहेगा . 
यदि कल "मैं " किसी 'हादसे' का शिकार होकर चल बसूं 
या मेरे जैसे कई "मैं " के साथ ऐसे हादसे होते रहें 
तब भी आज सुलगाई गई "स्वसासन " की यह मशाल 
सतत निरंतर  जलाये रखिये !!!
यह आवश्यक है !

स्वप्न साकार संकल्प / संघ का स्वप्न
यानी आज़ादी के रणबांकुरों का आजाद देश के लिए देखे गए
दिवास्वप्न को साकार करने के लिए  
हमारा, द्रढ़ निश्चय के साथ ,
साथ-साथ कदम बढ़ाना आवश्यक है .
मैं चल पड़ा हूँ आप भी मेरे साथ चलिए मेरे पीछे नहीं !!!
अगले अंक में स्वसासन के प्रशासनिक सुधार  सम्बन्धी  
तरीकों / नियमों / घोषणाओं की चर्चा लेकर शीघ्र ही आपके सम्मुख फिर उपस्थित होउंगा .
तब तक.
जय हिंद ! ! ! ! ! ! ! ! ! ! ! 

                  ( यहाँ तक का आलेख २१ वर्ष पूर्व लिखित ! 
अगले भाग समस्या का हल हेतु बस जरा सी प्रतीक्षा कीजिये ........)

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