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बुधवार, 30 दिसंबर 2015

गुरु - एक विचार

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गुरु - एक विचार
"गुरु" वह विचार है जो अनुचित और उचित का अंतर बताता है!
जिस व्यक्ति, पुस्तक या आख्यान से
आपके अब तक के अनुत्तरित प्रश्न का उत्तर मिल सके
या जो अनौखा प्रश्न प्रस्तुत करे
वह ही गुरु है
इससे इतर और कुछ नहीं !
निश्चय ही माता-पिता सबके प्रथम गुरु हैं
फिर अक्षर ज्ञान दाता से लेकर हर वह व्यक्ति
जिसने जब कभी आपके अनुत्तरित प्रश्न का समुचित उत्तर दिया हो
वह गुरु ही तो है!
गुरु यानी ज्ञान का भंडार
जिससे हरेक प्रश्न / शंका / दुविधा में उचित विमर्श प्राप्त हो सके!
एक भी हो सकता है अनेक भी
माता-पिता, शिक्षक, मित्र, जीवनसाथी, पुत्री-पुत्र, सहकर्मी या सहयात्री भी!
कोई गीत, आलेख, भाषण, पुस्तक, चित्र या स्वप्न भी....!
विचारवान जिज्ञासु के जीवन में फिर एक समय ऐसा भी आता है जब उसे
स्वयं से ही प्रश्न भी करना होता है
और हर 'उचित प्रश्न' का उत्तर भी स्वयं के अंतरमन में मिलने लग जाता है!
ऐसी गुरुतर दशा में पहुँचने पर भी
विगत के मार्गदर्शक समस्त गुरुओं का मान आपसे ऊँचा ही होना चाहिय़े....
किसने कितने प्रश्न हल किए के समकक्ष ही वह भी हो जिसने जटिलतम प्रश्न उत्तरित किया!
हरि ओम्
- #सत्यार्चन
..... अपेक्षित हैं समालोचना / आलोचना के चन्द शब्द...

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